दोहावली
दोहावली
भाग-8 दोहा संख्या 351 से 400 तक
दोहा संख्या 380 से 390
कै निदरहुँ कै आदरहुँ सिंघहि स्वान सिआर।
हरष बिषाद न केसरिहि कुंजर गंजनिहार।381।
381
ठाढ़ो द्वार न दै सकैं तुलसी जे नर नीच।
निंदहिं बलि हरिचंद को का कियो करन दधीच।382।
382
ईस सीस बिलसत बिमल तुलसी तरल तरंग।
स्वान सरावग के कहें लधुता लहै न गंग।383।
383
तुलसी देवल देव को लागे लाख करोरि।
काक अभागें हगि भर्यो महिमा भई कि थोरि।384।
384
निज गुन घटत नाग नग परखि परिहरत कोल।
तुलसी प्र्रभु भूषन किए गुंजा बढ़े न मोल।।385।
385
राकापति षोड़स उअहिं तारा गन समुदाइ।
सकल गिरिन्ह दव लाइअ बिनु रबि राति न जाइ।386।
386
भलो कहहिं बिनु जानेहूँ बिनु जानेहूँ बिनु जानें अपबाद।
ते नर गादुर जानि जियँ कहिय न हरष बिषाद।387।
387
पर सुख संपति देखि सुनि जरहिं जे बड़ बिनु आगि।
तुलसी तिन के भागते चलै भलाई भागि।388।
388
तुलसी जे कीरति चहहिं पर की कीरति खोइ।
तिनके मुँह मसि लागिहैं मिटहि न मरिहै धोइ।389।
389
तनु गुन धन महिमा धरम तेहि बिनु जेहि अभिमान।
तुलसी जिअत बिडंबना परिनामहु गत जान।।390।
390