दोहावली

दोहावली

भाग-8 दोहा संख्या 351 से 400 तक

दोहा संख्या 390 से 400 सासु ससुर गुुरू मातु पितु प्रभु भयो चहै सब कोइ। होनी दुजी ओर को सुजन सराहिअ सोइ।391।
391
सठ सहि साँसति पति लहत सुजन कलेस न कायँ। गढ़ि गुढ़ि पाहन पूजिऐ गंडकि सिला सुभायँ।392।
392
बड़े बिबुध दरबार तें भमि भूप दरबार। जापक पूजत पेखिअत सहत निरादर भार।393।
393
बिनु प्रपंच छल भीख भलि लहिअ न दिएँ कलेस। बावन बलि सों छल कियो दियो उचित उपदेश।394।
394
भलो भले सेां छल किएँ जनम कनौड़ो होइ। श्रीपति सिर तुलसी लसति बलि बावन गति सोइ।395।
395
बिबुध काज बावन बलिहि छलो भलो जिय जानि। प्रभुता तजि बस भे तदपि मन की गइ न गलानि।396।
396
सरल बक्र गति पंच ग्रह चपरि न चितवत काहु। तुलसी सूधे सूर ससि समय बिडंबित राहु।397।
397
खल उपकार बिकार फल तुलसी जान जहान। मेढुक मर्कट बनिक बक कथा सत्य उपखान।398।
398
तुलसी खल बानी मधुर सुनि समुझिअ हियँ हेरि। राम राज बाधक भई मूढ़ मंथरा चेरि।399।
399
जोंक सूधि मन कुटिल गति खल बिपरीत बिचारू। अनहित सोनित सोष सो सो हित सोषनहारू।400।
400
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