दोहावली

दोहावली

भाग-9 दोहा संख्या 401 से 450 तक

दोहा संख्या 401 से 410 नीच गुड़ी ज्यों जानिबो सुनि लखि तुलसीदास। ढीलि दिएँ गिरि परत महि खैंचत चढ़त अकास।401।
401
भरदर बरसत कोस सत बचैं जे बूँद बराइ। तुलसी तेउ खल बचन सर गए न पराइ।402।
402
पेरत कोल्हू मेलि तिली सनेही जानि। देखि प्रीति की रीति यह अब देखिबी रिसानि।403।
403
सहबासी काचो गिलहिं पुरजन पाक प्रबीन। कालछेप केहि मिलि करहिं तुलसी खग मृग मीन।404।
404
जासु भरेासें सोइऐ राखि गोद में सीस। तुलसी तासु कुचाल तें रखवारो जगदीश।405।
405
मार खोज लै सौंह करि करि मत लाज न त्रास। मुए नीच ते मीच बिनु जे इन कें बिस्वास।406।
406
परद्रोही परदार रत परधन पर अपबाद। ते नर पावँर पापमय देह धरें मनुजाद।407।
407
बचन बेष क्यों जानिए मन मलीन नर नारि। सूपनखा मृग पूतना दसमुख प्रमुख बिचारि।408।
408
हँसहि मिलनि बोलनि मधुर कटु करतब मन माँह। छुवत जो सकुचइ सुमति सो तुलसी तिन्ह की छाँह।409।
409
कपट सार सूची सहस बाँधि बचन परबास। कियो दुराउ चहौ चातुरीं सो सठ तुलसीदास।410।
410
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