दोहावली
दोहावली
भाग-9 दोहा संख्या 401 से 450 तक
दोहा संख्या 421 से 430
सहज सुहृय गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि।
सेा पछिताइ अधाइ उर अवसि हाइ हित हानि।।421।
421
भरूहाए नट भाँट के चपरि चढे़ संग्राम।
कै वै भाजे आइहैं कै बाँधे परिनाम।422।
422
लेाक रीति फूटी सहहिं आँजी सहइ न कोइ।
तुलसी जो आँजी सहइ सो आँधरो न होइ।।423।
423
भागें भल ओड़ेहुँ भलो भलो न घालें घाउ।
तुलसी सब के सीस पर रखवारो रघुराउ।424।
424
सुमति बिचारहिं परिहरहिं दल सुमनहुँ संग्राम।
सकुल गए तनु बिनु भए साखी जादौ काम।425।
425
कलह न जानब छोट करि कलन कठिन परिनाम।
लगति अगिनि लघु नीच गृह जरत धनिक धन धाम।426।
426
छमा रोष के दोष गुन सुति मनु मानहिं सीख।
अबिचल श्राीपति हरि भए भूसुर लहै न भीख।427।
427
कौरव पांडव जानिऐ क्रोध छमा के सीम।
पाँचहि मारि न सौ सके सयौ सँघारे भीम।428।
428
बोल न मोटे मारिऐ मोटी रोटी मारू।
जीति सहस सम हारिबो जीतें हारि निहारू।429।
429
जो परि पायँ मनाइए तासों रूठि बिचारि।
तुलसी तहाँ न जीतिऐ जहँ जीतेहूँ हारि।430।
430