दोहावली

दोहावली

भाग-9 दोहा संख्या 401 से 450 तक

दोहा संख्या 431 से 440 जूते ते भल बूझिबो भली जीति तें हार। डहकें तें डहकाइबो भलो जो करिअ बिचार।431।
431
जा रिपु सों हारेहुँ हँसी जिते पाप परितापु। तासेंा रारि निवारिऐ समयँ सँभारिअ आपु।432।
432
जो मधु मरै न मारिऐ माहुर देइ सो काउ। जग जिति हारे परसुधर हारि जिते रघुराउ।433।
433
बैर मूल हर हित बचन प्रेम मूल उपकारं। दो हा सुभ संदोह सो तुलसी किएँ बिचार।434।
434
रोष न रसना खोलिऐ बरू खेालिअ तरवारिं । सुनत मधुर परिनाम हित बोलिअ बचन बिचारि।435।
435
मधुर बचन कटु बोलिबो बिनु श्रम भाग अभाग। कुहू कलकंठ रव का का कररत काग।436।
436
पेट न फूलत बिनु कहें कहत न लगाइ ढेर। सुमति बिचारें बोलिऐ समुझि कुफेर सुफेर।437।
437
छिद्यो न तरूनि कटाच्छ सर करेउ न कठिन सनेहु। तुलसी तिन की देह को जगत कवच करि लेहु।438।
438
सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु। बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु।439।
439
बचन कहे अभिमान के पारथ पेखत सेतु। प्रभु तिय लूटत नीच भर जय न मीचु तेहिं हेतु।440।
440
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