राधा नाम सों चित रांच

Abhilash Madhuri — श्री ललित किशोरी देव

Verse 10 of 115

(राग देस उतरी) कौन चूक चित धरी स्वामिनी जो मम सुरति विसारी। [1] निज सेवा तें छेंकि दई हा श्रीवनतें करी न्यारी॥ [2] जद्यपि नहिं उचित कछु कहिवो दुख नहिं जात सहारी। [3] ललितकिशोरी वेगी वुलावहु, करौ टहल अधिकारी॥ [4] - ललित किशोरी जी, अभिलाष माधुरी, विनय (25) (राग देश उतारी) जो मालकिन अपनी माँ की खूबसूरती बरकरार रखती है, उसकी किसे परवाह है। [1] मेरी सेवा मेरी सेवा से बेहतर है.. [2] मैं कुछ भी सही नहीं कहना चाहता, इससे दुख नहीं होता। [3] ललित किशोरी वेगि वुलावहु, करौ टहल अधिकारी.. [4] - ललित किशोरी जी, अभिलाष माधुरी, विनय (25)
राधा नाम को आधारराधे बहुत भई अब माफ़ करो