राधे बहुत भई अब माफ़ करो
Abhilash Madhuri — श्री ललित किशोरी देव
Verse 11 of 115
(राग सोरठि)
राधे बहुत भई अब माफ़ करो।
श्री वृंदावन सुख दरसावहु ऊक चूक उरमें न धरो॥ [1]
अपनो करि जन नाहिं निवारो ता प्रणतें अवहू न टरो।
ललित किशोरी गिनौ न औगुन निज करुना की टरनि टरौ॥ [2]
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (27)
(राग सोरठी) राधे भाई, अब मुझे माफ कर दो। श्री वृन्दावन सुख दर्शनु उक चुक उरमेन न धरो.. [1] अपनो करि जन नहिं निवारो ता प्रणतेन अवहु न तारो। ललित किशोरी, अपनी करुणा के प्राण मत गिनें.. [2] - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (27) हे श्री राधे, बहुत हो गया, कृपया हमारा अपमान क्षमा करें और हमें अपने वृन्दावन की प्रसन्नता दिखाएँ। [1]