कालीदह कूल कुंजके माहीं

Abhilash Madhuri — श्री ललित किशोरी देव

Verse 12 of 115

(राग जैजैवंती) कालीदह कूल कुंजके माहीं, भ्रमरी है दुमडारि रहौं। कीर कोकिला ह्वै निधुवन में, मधुरे राधानाम कहौं॥ [1] गुल्म लता गहिवर की ह्वैकै, वृंदावन को वास चहौं । ललितकिशोरी रेणु कीजिये, जुगुलचरण उर आंक रहौं॥ [2] - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (28) (राग जैजैवंती) कालीदह कुल कुंजके माही, भ्रामरी है दमादरि रहौं। फिर कोकिला निधुवन पुरुष है, मैं कहता हूँ मधुरे राधानाम। [1] मैं गहिवरा का फूल हूं, वृन्दावन में रहना चाहता हूं। ललित किशोरी रेनू करिये, जुगुला चरण उर अंक रहूँ.. [2] - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (28)
राधे बहुत भई अब माफ़ करोराधा नाम को आधार