जो कोउ वृंदावन रस चाखै
Abhilash Madhuri — श्री ललित किशोरी देव
Verse 33 of 115
(राग झिंझोटी)
जो कोउ वृंदावन रस चाखै।
भवन चतुर्दश तिहूं लोक को, सपनिहुँ नहिं अभिलाखै॥ [1]
ललितकिशोरी पड़यौ कोन में श्याम राधिका भाखै।
जुगुल रूप विनु पलक न खोलैं लोभ दिखावो लाखै॥ [2]
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, फुटकर पद (71)
(राग झिंझोटी) जो वृन्दावन के रस का स्वाद लेता है। भवन चतुर्दश तीन लोक, स्वप्न नहीं। [1] ललित किशोरी पदायु में, जिसमें श्याम राधिका की रुचि थी। जुगुल रूप विनु पलक न कलैन लोभा शो लखाई.. [2] - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, रिटेल पोस्ट (71)