मोसों नाहिं कछुक बनिआई
Abhilash Madhuri — श्री ललित किशोरी देव
Verse 34 of 115
(राग मालकौस)
मोसों नाहिं कछुक बनिआई।
हों सदैव औगुनकी भाजन, कूटि कूटि करि भरी बुराई॥ [1]
हाहा कृपाकरौं स्वामिनि अब, तुव पदपंकज में शिर नाई।
ललितकिशोरी ब्रज दरसावो, देखो निजगुन मान वडाई॥ [2]
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (73)
(राग मालकौसा) मोसो नहीं कचुक बनै। मान सदायव अगुणकी भजन, कुटी कुटी कारी भारी बुरी।।[1] हे प्रभु, अब दया करो, मेरा सिर आपके चरणों में है। ललित किशोरी ब्रज दरसवो, देखो निजगुण मन वदाई.. [2] - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (73)