स्वामिनि हौं पतितन शिरताज

Abhilash Madhuri — श्री ललित किशोरी देव

Verse 38 of 115

(राग जंगला) स्वामिनि हौं पतितन शिरताज। तेरी जगत कहाय बिमुख ज्यों, डोलत लगत न लाज॥ [1] श्रीवन बेगि बसाय उबारो, नाहिंन परम अकाज। ललिताकिशोरी बिषे सिंधु महं, बूडत वैस जहाज॥ [2] - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (81) (राग जंगला) स्वामिनी हूं पतितां शीर्षज। मानो तुम्हारा संसार उदासीन है, उसे शर्म नहीं आती.. [1] श्रीवन बेगी बसय उबरो, नहिं परम अकाज। ललित किशोरी बिशे सिंधु महान, बुदत वैस जहाज़.. [2] - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (81)
राधा नाम को आधारयेहो स्वामिनि गजगामिनि मनभामिनि