अष्टसिद्धि नवनिधि के सुखको वेपरवाहि लुटावेंगे
Abhilash Madhuri — श्री ललित किशोरी देव
Verse 48 of 115
(राग लावनी)
अष्टसिद्धि नवनिधि के सुखको वेपरवाहि लुटावेंगे।
चौदोभवन त्रिलोकी संपति वायें हाथ वहावेंगे॥ [1]
ललितकिशोरी जब श्रीवनमें कुंज वसेरो पावेंगे।
हंस हंसके तब ब्रह्मानंद की गलियों धूरि उडावेंगे॥ [2]
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (119)
(राग लावनी) अष्टसिद्धि नवनिधि का सुख उन लापरवाहों द्वारा नष्ट कर दिया जाएगा। तीनों लोकों की चारों इमारतें मजबूत और जिद्दी होंगी। [1] जब ललित किशोरी को श्रीवन्मन कुंज वसेरो मिलता है। HNS ब्रह्मानंद की गलियों को हँसाएगा.. [2] - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (119)