राधा नाम को आधार
Abhilash Madhuri — श्री ललित किशोरी देव
Verse 49 of 115
मो मन कब अनुरागिहै, जुगुल कमलपग तीर।
ज्यों प्यासे की लालसा, निर्मल सीतल नीर॥
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय श्रृंगार शतक (120)
मो मन कब अनुरागिहाई, जुगुल कमलापग तीर। प्यासे की प्यास की तरह निर्मल शीतलता दूर हो जाती है.. - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय श्रृंगार शतक (120)