कालीदह कूल कुंजके माहीं

Abhilash Madhuri — श्री ललित किशोरी देव

Verse 51 of 115

(राग जैजैवंती) तनमन हमारो सो तो सबही लडैतीजू को, जीवन हमारो वृषभानुजा दुलारी हैं। [1] अधर अमृत पान रसना ललचाई, हाथ हू हमारे पद सेवा अधिकारी हैं॥ [2] कोऊ पर ब्रह्म जगव्यापि निराकार कहो, ललित किशोरी वन कुंजन विहारी हैं। [3] नैना हूँ हमारे मृगछौना हैं खिलौना वीर, पलकैं हमारी मग प्यारी की बुहारी हैं॥ [4] - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (123) (राग जयजयवंती) मेरा दिल इतना भर गया है कि मैं इसके लिए लड़ता हूं, जीवन मेरी मधुर वृषभानुजा है। [1] अधर अधर अमृत के लालची, हाथ हमारे सेवा अधिकारी.. [2] कुएं के उस पार कहो ब्रह्मा विश्वरूप, ललित किशोरी वन कुंजन विहारी। [3] मेरी आँखें हमारे हिरणों का खिलौना वीर हैं, मेरी पलकें हमारे प्रियतम की दुल्हन हैं.. [4] - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (123)
कवधौं कृपा लाड़िली ह्वै हैकवधौं कृपा लाड़िली ह्वै है