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Abhilash Madhuri — श्री ललित किशोरी देव
Verse 53 of 115
(जोगिया कलंगड़ा)
मनुआं मत कर निमक हरामी।
सेय निकुंजद्वार निशिवासर आलस तजि खल कामी॥ [1]
विगरी वेग समार रसिक हो सतगुर करस गुलामी।
बहुत दिना लौं ललितकिशोरी पतितन में रहो नामी॥ [2]
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (157)
(जोगिया कलंगड़ा) मनुआन मत कर हरामी। सेय निकुंजद्वार निशिवासर अलस तजि खल कामी.. [1] विगारी वेग समर रसिक हो सतगुर करस गुलामी। ललित किशोरी, तुम दीर्घायु हो, जग में विख्यात रहो.. [2] - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (157)