कालीदह कूल कुंजके माहीं
Abhilash Madhuri — श्री ललित किशोरी देव
Verse 55 of 115
(राग जैजैवंती)
मैं दासी अपनी राधा की
करत खवासी जो रुचि पावत। [1]
सूधे वचन न बोलत सपनेहु
हरिहू को अँगुठा दिखरावत॥ [2]
ब्रह्मानंद मगन सुख सिधि निधि
श्रीवन गैल पांव ठुकरावत। [3]
मुसतगनी मगरूरी डोलत
ललितकिशोरी को गुन गावत॥ [4]
- ललित किशोरी जी, अभिलाष माधुरी, विनय (291)
(राग जैजैवंती) मैं दासी अपनी राधा के लिए जो कुछ भी करने में रुचि रखती हूं वह करती हूं। [1] सपनेहु हरिहू अच्छे वचन नहीं बोलता और अंगूठा दिखाता है। [2] ब्रह्मानंद उनकी खुशी और उपलब्धि से प्रसन्न हैं, उन्होंने श्रीवन गेला पनव को अस्वीकार कर दिया है। [3] मुस्तगानी मगरुरी दोलत ललित किशोरी को गुना गावत.. [4] - ललित किशोरी जी, अभिलाष माधुरी, विनय (291)