श्रीराधारानी श्रीवन दृग दरसावौ
Abhilash Madhuri — श्री ललित किशोरी देव
Verse 6 of 115
(राग झँझोटी)
श्रीराधारानी श्रीवन दृग दरसावौ।
अंकित पग मग धूरि विपिनकी, मम अंगन परसावौ॥ [1]
ललित किशोरी रसिक लाल संग, सुरतिरंग बरसावौ।
उमहीं घटा विजुरिया लौंकत, जीरा जिनि तरसावौ॥ [2]
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (15)
(राग झंझोटी) श्रीराधारानी श्रीवान् दृग दरस्वौ। अंकित पग मग धुरी विपिनकी, मम आंगन परसावौ।।[1] ललित किशोरी रसिक लाल संग, सुरतिरंग बरसावौ। उमाहिं घट विजुरिया लौंकट, जीरा जिनि तरसावौ.. [2] - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (15)