येहो स्वामिनि गजगामिनि मनभामिनि
Abhilash Madhuri — श्री ललित किशोरी देव
Verse 74 of 115
(राग परज)
अहो विहारनि ललित लड़ैती, मम अपराध न मन में धारो।
अपनी जानी मानी दासी वलि, कृपा विलोकनि नेक निहारो॥ [1]
श्रीवन कुञ्ज कुटीर कोन में, ललित किशोरी मौकों डारो।
करुणा सिंधु अगाधे राधे, विगरी को अब वेगि सम्हारो॥ [2]
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (82)
(राग परजा) हे विहाराणि ललित लड़ैती, कोई अपराध मत करो, अपने मन को मत रोको। अपनी मणि मणि दासी वाली, कृपा विलोकनि नेक नियारो.. [1] श्रीवन कुंज कुटीर कौन पुरुष, ललित किशोरी मौकोन दरो। करुणा सिंधु अगाधे राधे, विगारी को वेगी सम्हारो अब.. [2] - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (82)