प्रथम सहचरी भाव हिय
Adivani — श्री रामराय
Verse 10 of 11
श्रीबृन्दावन प्यारौ प्यारी कौ तासौं मेरौ अविचल प्यार।
निश दिन छिन छिन द्विगुन चतुर्गुन वढ़न चढ़न श्री वन उनिहार॥ [1]
विविध वल्लरी विलसित कुसुमित कोटि कलप पल्लव रतनार।
श्रीरामराय राधामाधव कौ होत निरन्तर रासविहार॥ [2]
- श्री रामराय जी, आदिवाणी (81)
प्रिय श्री बृंदावन, कृपया मुझे अपना अटूट प्रेम दिखाएं। निश दिन छिन छिन द्विगुण चतुर्गुण वधन छाधन श्री वन उनिहार।।[1] विविध वल्ली, भव्य फूल, ढेर सारे कलाप पल्लव रत्नार। निरंतर रसविहार पीने वाले श्री राम राय राधामाधव.. [2] - श्री राम राय जी, आदिवासी (81)