प्रथम सहचरी भाव हिय

Adivani — श्री रामराय

Verse 9 of 11

रे मन करि श्रीवन अनुराग॥ [1] चौरासी लखि सीढ़ी चढ़ि बढ़ि महल टहल हित आयौ लाग। पतन भये पुनि जतन न पैये जनम जनम भूले भ्रमराग॥ [2] मीतपाय श्रीराधामाधव रिपु दल दल क्यों जात अभाग। श्रीराम राय भगवानदास सुन श्रीवृन्दावन छिन्हु न त्याग॥ [3] - श्री रामराय, आदिवाणी (93) रे मन करि श्रीवन अनुराग.. [1] चौरासी लखि सिधाई चढ़ै बधाई महल टहल हित आय लग। पाटन भये पुनि जतन पाए जनम जनम भूले भ्रमरग।।[2] श्री राधामाधव रिपु अलग-अलग समूहों को मिटाकर लोग क्यों अभागे हो जाते हैं। श्री राम राय भगवानदास सूर्य श्री वृन्दावन छिनहु न त्याग.. [3] - श्री राम राय, आदिवाणी (93)
प्रथम सहचरी भाव हियप्रथम सहचरी भाव हिय