प्रथम सहचरी भाव हिय

Adivani — श्री रामराय

Verse 3 of 11

प्रथम सहचरी भाव हिय, धार कुञ्ज के द्वार। मंगल जुगल किशोर हित, गावै रुचिर प्रकार॥ - श्री रामराय जी, आदिवाणी, दोहा (102.1) धार कुंज के द्वार पर प्रथम साथी भव। मंगल जुगल किशोर हित, गवै रुचिर प्रकार.. - श्री राम राय जी, आदिवासी, दोहा (102.1)
प्रथम सहचरी भाव हियप्रथम सहचरी भाव हिय