प्रथम सहचरी भाव हिय
Adivani — श्री रामराय
Verse 8 of 11
रसिकन कृष्ण प्रेमरस निधिसौं, काढ़ी अलक लेड़ैती राधा।
प्राकृत विविधवासना वबिजनु, हरत निरन्तर अमित अवाधा॥ [1]
आनन्द की हू आनम्ददायिनी, परमादि व्यप्रभा सुखसाधा।
श्रीरामराय की जीवनि स्वामिनि, अविचल प्रनय आल्हाद अगाधा॥ [2]
- श्री रामराय जी, आदिवाणी (60)
रसिकन कृष्ण प्रेमरस निधिसौं, काधि अलक लेदैति राधा। प्राकृत विविद्वस्ना वबीजनु, हरत निरंतर अमित अवध। [1] मैं आनंद की अनामदादायिनी, परमादि व्यप्रभा सुखसाधा हूं। श्री राम राय स्वामिनी की जीवनी, अविचल प्रणय अल्हड़ अगाधा.. [2] - श्री राम राय जी, आदिवासी (60)