नारायण दुख सुख उभै

Anurag Ras — श्री नारायण स्वामी

Verse 81 of 106

रूप छके झूमत रहैं, तन को तनक न ज्ञान। नारायण दृग जल भरे, यही प्रेम पहचान॥ - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (155) रूप नाचता रहता है, शरीर को कुछ भी पता नहीं चलता। जल से नारायण का जल भरो, यही प्रेम की पहचान है.. - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (155)
नारायण दुख सुख उभैनारायण दुख सुख उभै