कबहूँ-कबहूँ मन इत-उत जात, यातैंब कौन अधिक सुख

Ashtadash Pada —

Verse 10 of 16

(राग विभास) कबहूँ-कबहूँ मन इत-उत जात, यातैंब कौन अधिक सुख। [1] बहुत भाँतिन घत आनि राख्यौ, नाहिं तौ पावतौ दुख॥ [2] कोटि काम लावन्य बिहारी, ताके मुहांचुहीं सब सुख लियैं रहत रुख। [3] श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा-कुंजबिहारी कौ दिन देखत रहौं विचित्र मुख॥ [4] -ललिता अवतार श्री हरिदास जी, अष्टादश पद (03) (राग विभास) कभी-कभी मन इधर-उधर भटकता है, फिर भी इससे बड़ी कोई खुशी नहीं है। [1] बहुत तरह से तुमने मुझे रखा है, अगर तुम मुझे कोई गम न दो.. [2] तुम बहुत खुश हो, मैं सारी खुशियां मुंह में ले रहा हूं, इसी एहसास में जी रहा हूं. [3] श्री हरिदास के स्वामी श्याम-कुंजबिहारी, मैं नित क्यों देखूँ पराया मुख.. [4] -ललिता अवतार श्री हरिदास जी, अष्टादश पाद (03)
कबहूँ-कबहूँ मन इत-उत जात, यातैंब कौन अधिक सुखकबहूँ-कबहूँ मन इत-उत जात, यातैंब कौन अधिक सुख