कबहूँ-कबहूँ मन इत-उत जात, यातैंब कौन अधिक सुख

Ashtadash Pada —

Verse 11 of 16

(राग विभास) काहू कौ बस नाहिं, तुम्हारी कृपा तैं सब होय बिहारी-बिहारिनि। [1] और मिथ्या प्रपंच, काहे कौं भाषियै, सु तौ है हारिनि॥ [2] जाहि तुमसौं हित, तासौं तुम हित करौ, सब सुख कारनि। [3] श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा-कुंजबिहारी, प्रानन के आधारनि॥ [4] - ललिता अवतार श्री हरिदास जी, अष्टादश पद (02) (राग विभास) कौन नहीं काफी, सब तेरी कृपा है, बिहारी-बिहारिणी। [1] और मिथ्या संसार, यदि कोई इस पर टिप्पणी नहीं कर सकता, तो आप हारे हुए हैं.. [2] अपना भला करो, अपना भला करो, सभी सुखों का आनंद लो। [3] श्री हरिदास के भगवान श्यामा-कुंजबिहारी, जीवन की उत्पत्ति.. [4] - ललिता अवतार श्री हरिदास जी, अष्टादश पाद (02)
कबहूँ-कबहूँ मन इत-उत जात, यातैंब कौन अधिक सुखजगत प्रीति करि देखी