जगत प्रीति करि देखी

Ashtadash Pada —

Verse 6 of 16

(राग कल्याण) जगत प्रीति करि देखी नाहिनें गटी कौ कोऊ। [1] छत्रपति रंक लौं देखे प्रकृति बिरोध बन्यों नहिं कोऊ॥ [2] दिन जो गये बहुत जनमनि के ऐसें जाउ जिनि कोऊ। [3] कहें श्रीहरिदास मीत भले पाये बिहारी ऐसौ पावौ सब कोऊ॥ [4] - ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, अष्टादश पद (15) (राग कल्याण) जग से प्रेम करो, गति मत देखो। [1] छत्रपति रांका लौं देखे, नहीं बन्यो आपकी प्रकृति.. [2] जो दिन बीत गए वे जन्म-जन्मांतर के दिनों की तरह नहीं हैं। [3] श्री हरिदास जी ने बिहारी के बारे में ऐसा क्यों सोचा? [4] - ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, अष्टादश पाद (15)
प्रेम-समुद्र रूप-रस गहरे, कैसैं लागैं घाटप्रेम-समुद्र रूप-रस गहरे, कैसैं लागैं घाट