वृन्दाविपिन प्रणाम करि
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 10 of 268
(सवैया)
कैसौ फव्यौ है नीलांबर सुंदर, मोहि लिये मन-मोहन माई। [1]
फैलि रही छवि अंगनि कांति, लसै बहु भाँति सुदेस सुहाई॥ [2]
सीस कौ फूल सुहाग कौ छत्र, सदा पिय के मन कौं सुखदाई। [3]
और कछू न रुचै ध्रुव पीय कौं, भावै यहै सुकुमारि लडाई॥ [4]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (06)
(सवैया) नीलानबर कितना सुन्दर है, मन को मोह लेता है। [1] फेलि रहि छवि अंगनि कांति, लसै बहु बहंती सुदेस सुहाई.. [2] सीस फूल छाता, सदा मन को सुख दे। [3] और कछू न रुचै ध्रुव पिया कौन, भवै याहि सुकुमारि लड़ै.. [4] - श्री हित ध्रुवदास, बयालिस लीला, शृंगार शत 1 (06)