वृन्दाविपिन प्रणाम करि

Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास

Verse 112 of 268

जुगल-प्रेम रस-सार सर, रसिक-हंस अवगाही। जगत काक-बक बिमुख जे, पलकहुँ पहुँचत नाँहिं॥ - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, नृत्य विलास (47) जुगल-प्रेम रस-सार सार, रसिक-हंस अवगाही। जगत काका-बक बिमुख जे, पलकहुं पहत नाहिं.. - श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, नृत्य विलास (47)
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