वृन्दाविपिन प्रणाम करि
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 113 of 268
सकहि तौ वृन्दाविपिन बसी, छिन-छिन आयु बिहात।
ऐसौ समै न पाइहै, भली बनी है बात॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (48)
मेरा मित्र वृंदाविपिन में रहता है, मेरा जीवन विकर्षणों से भरा है। इतना ही काफी नहीं है, बात तो अच्छी बनी है.. - श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, वृन्दावन शत लीला (48)