वृन्दाविपिन प्रणाम करि

Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास

Verse 114 of 268

छाँड़ि स्वाद सुख देह के, और जगत की लाज। मनहिं मारि तन हारी कै, वृंदावन में गाज॥ - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (49) सुख का स्वाद शरीर का है और लज्जा का स्वाद संसार का है। मनहिं मारि तन हरि कै, वृन्दावन में गज.. - श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, वृन्दावन शत लीला (49)
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