राजति कुँवरि परम सुकुवाँरी

Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास

Verse 12 of 268

(राग विलावल ) राजति कुँवरि परम सुकुवाँरी। भोर कुंज ते निकसि खरी भई, रुचिर बाहु पिय अंसनि डारि॥ [1] कबरी सिथिल सकल अँग भूषण, लटकि रही प्रियतम उर लागि। सुरत सरस रँग-भरी लाडिली , आरस में राखी मनौ पागि॥ [2] मुद्रित होत नेंन छिन ही छिन, रैंन जगी तातें अधिक जँभाति। 'हित ध्रुव' यह सुख निरखि मुदित मन सहचरि, दै चुटकी बलि जाति॥ [3] - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (7) (राग विलावल) राजति कुंवारी परम सुकुवंरि। भोर कुंज ते निकसी खड़ी भाई, रुचिर बहु ​​पिया अंसनि डारि.. [1] काबरी सिथिल सकल अंग भूषण, फंस प्रिया प्रिय उर लागी। सुरत सरसा रंग-भरी लड़िली, अरस में राखी मनौ पगी.. [2] मुद्रित होत नेन छिन ही छिन, रैन जगी तातेन अधिक जाम्बति। 'हित ध्रुव' यः सुख निरखि मुदित मन सहचरी, दा चुटकी बाली जाती। [3] - श्री हित ध्रुवदास, बयालिस लीला, पद्यावली (7)
वृन्दाविपिन प्रणाम करिवृन्दाविपिन प्रणाम करि