वृन्दाविपिन प्रणाम करि
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 122 of 268
ढूँढ़ि फिरै त्रैलोक जो, बसत कहूँ 'ध्रुव' नाहिं।
प्रेम रूप दोउ एक रस, बसत निकुंजनि माहिं॥
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, प्रेमावली (53)
ढूंढता रहता हूं ये दुनिया, मैं इसे 'ध्रुव' नहीं कह सकता. प्रेम रूप दोउ एक रस, बसत निकुंजनि माहिं.. - श्री हित ध्रुवदास, बयालिस लीला, प्रेमावली (53)