वृन्दाविपिन प्रणाम करि
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 133 of 268
(कुंडलियाँ)
बार-बार तो बनत नहिं , यह संजोग अनूप।
मानुष तन वृन्दाविपिन , रसिकनि सँग विवि रूप॥ [1]
रसिकनि सँग विवि रूप:, भजन सर्वोपरि आहि ।
मन दै 'ध्रुव' यह रंग, लेहु पल-पल अवगाही॥ [2]
जो छिन जात सो फिरत नहीं, करहु उपाइ अपार।
सकल सयानप छाँड़ि भजि, दुर्लभ है यह बार॥ [3]
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, रहस्य लता (60)
(राशिफल) बार-बार नहीं बनता, याह स्नजोग अनूप। मानव शरीर वृंदाविपिन, रसिकानि संग विवि रूपः। [1] रसिकानि संग विवि रूपः, भजन सर्वोपरि है। मन 'ध्रुव' को ये रंग देता है, हर पल का ख्याल रखता हूं.. [2] जो छीन जाता है वो वापस नहीं आता, उसे अपरिमेय बना देता हूं। सकल सयानप चंडी भाजी, यह समय दुर्लभ है.. [3] - श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, रहस्य लता (60)