वृन्दाविपिन प्रणाम करि

Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास

Verse 136 of 268

यद्यपि धावत विषै कौं, भजन गहत बिच पानि। ऐसे वृन्दाविपिन की सरन गही ध्रुव आनि॥ - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (60) विषय दृष्टि में न होने पर भी भजन में गहराई नहीं आती। ध्रुव अनी ने ऐसे वृंदाविपिन की शरण ली.. - श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, वृन्दावन शत लीला (60)
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