आज सखि निरख रूप भरि नैन
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 138 of 268
(राग विहागरौ)
रस भरे लाल रस भरी राधे,
रस भरी सखी अवलोकत रंगहि।
मदन हुलास बाढ़यौ प्रीतम मन,
अतिहि चाव सौं भरत उछंगहि। [1]
अद्भुत कोक-कलनि की उमगनि,
लज्जित करत अनंगहि।
‘हित ध्रुव’ चतुर सिरोमनि दोऊ,
विलसत प्रेम-तरंगहि। [2]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (61)
(राग विहगरौ) रस भरे लाल रस भारी राधे, रस भरी सखी अवलोकत रंगहिं। मदन हुलास, बधाई हो प्रिय हृदय, तुम भारत से बहुत खुश हो। [1] अद्भुत कोका-कलानी का उत्साह, शर्मनाक अज्ञानता। 'स्तंभ पर प्रहार' चतुर सिरोमणी युगल, विलासितापूर्ण प्रेम की तरंगें। [2] - श्री हित ध्रुवदास, बयालिस लीला, पद्यावली (61) रसदार लाल एवन रसदार प्रिया की रसीली सखियाँ रंग-केली का अवलोकन कर रही हैं। प्रियतम के हृदय में मदनोलस बढ़ता जा रहा है अर्थात् वह उत्साहपूर्वक बार-बार प्रिया को अपना ईश्वर मान रहा है। [1] दो नर कोक-कलाओं का यह अद्भुत उद्भव कामदेव को भी लज्जित कर रहा है। श्रीहित ध्रुवदास जी कहते हैं कि कोका काल में चतुर शिरोमणि युगल प्रेम की लहरों में डूबे लोगों को आनंदित करते रहते हैं। [2]