वृन्दाविपिन प्रणाम करि
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 140 of 268
छण भंगुर तन जात है, छाँड़हि विषै अलोल।
कौड़ी बदले लेहि तू, अद्भुत रतन अमोल॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (63)
शरीर भुरभुरा हो जाता है और शरीर विषैला हो जाता है। कभी-कभी तुम बदल जाते हो, अद्भुत रत्न अमोल.. - श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, वृन्दावन शत लीला (63)