वृन्दाविपिन प्रणाम करि

Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास

Verse 142 of 268

कोटि कोटि हीरा रतन, अरु मणि विविध अनेक। मिथ्या लालच छाँड़ि कै, गहि वृन्दावन एक॥ - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (64) करोड़ों हीरे, जवाहरात और तरह-तरह के रत्न। कहाँ मिथ्या लोभ, कहाँ वृन्दावन एक.. - श्री ध्रुवदास, बलियास लीला, वृन्दावन शत लीला (64)
प्रिया मुख निरखत नवलवृन्दाविपिन प्रणाम करि