गरजनि घन अरु दामिनी
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 151 of 268
(राग मलार)
काम रस भींजे हैं दोउ लाल।
पानिप रूप बढ़ी कछु औरे, घूमत नैंन विसाल॥ [1]
छूटी अलक टूटी हारावलि, श्रम जलकन बने भाल।
सूरत-समर-सर ते नहिं निकसत, 'हित ध्रुव' उभय मराल॥ [2]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (69)
(राग मलारा) काम रस भींजे हैं दोउ लाल। पनीप का रूप कुछ और हो गया, भटकती आंखें विशाल हो गईं... [1] हरियाली टूट गई, भालू श्रम के जल बन गए। सुरता-समर-सर से नहीं है निकास, 'हित ध्रुव' उभय मराल। [2] - श्री हित ध्रुवदास, बयालिस लीला, पद्यावली (69)