वृन्दाविपिन प्रणाम करि
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 159 of 268
वृन्दावन तो आनंद घन, तो तन नश्वर आहि।
पशु ज्यों खोवत विषै रस, काहि न चिंतत ताहि॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (76)
यदि हमें वृन्दावन में सुख मिलता है तो हमारा शरीर नाशवान है। जैसे पशु विषैले रस को तरसते हैं, उन्हें कोई चिन्ता नहीं.. - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (76)