आज सखि निरख रूप भरि नैन
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 176 of 268
(राग विहागरौ)
रंगीली करत रंगीली बात।
सुनि सुनि नवल रसिक मन-मोहन, फिरि-फिरि फिरि ललचात॥ [1]
चितै चितै मुख मधुर माधुरी, उरजनि सौं लपटात।
'हित ध्रुव' रस को सिंधु उमड़ि चल्यौ, पिय के हिय न समात॥ [2]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (93)
(राग विहागरौ) रेंगिली करात रेंगिली बट। सुनो, सुनो, बार-बार नया, रोमांटिक, मनोरम, मनमोहक। [1] चितै चितै मुख मधुर माधुर्य, उर्जनि सौं पतातत्। 'हित ध्रुव' रस को सिन्धु उमादै चल्यौ, पिया के हिय न समात.. [2] - श्री हित ध्रुवदास, बयालिस लीला, पद्यावली (93)