वृन्दाविपिन प्रणाम करि
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 177 of 268
रसमय देखत फिरै बन, नैनन बन रहै आइ।
कहुँ-कहुँ आनंद रंग भरि, परै धरनि थहराइ॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृंदावन शत लीला (94)
मैं समय देखता रहता हूँ, मेरी दृष्टि धुंधली होती जा रही है। मैं कहता हूं सुख भारी है, परदेश है.. - श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, वृन्दावन शत लीला (94)