ऐसौ और सनेही कौन
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 181 of 268
(राग कान्हरौ)
ऐसौ और सनेही कौन।
रंगे एकही रंग रँगीलौ, तजि कैं विभौ चतुरदस भौन॥ [1]
छिन-छिन चरन-कमल सहरावत, कबहूँ करत पट-पीत सौं पौंन।
ऐसौ प्रेम कहा कोउ बरनै, जहाँ सकल सुख गौंन॥ [2]
अद्भुत रूप माधुरी निरखत, भरि-भरि लोइनि दौंन।
‘हित ध्रुव’ तजि मर्जाद बड़ाई, ह्वै रहे सबै बात में मौंन॥ [3]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (97)
(राग कान्हरौ) ऐसौ और सनेही कौन हैं? विभाऊ चतुरदास की भौहें कहाँ हैं, एक ही रंग से रंगी हुई? कहाँ है ये प्यार, कहाँ है सारी खुशियाँ? [2] माधुरी का रूप अद्भुत है, शरीर भरा हुआ है। 'हित ध्रुव' तजि मरजाद बड़े, मैं हर बात पर चुप रहता हूँ.. [3] - श्री हित ध्रुवदास, बयालिस लीला, पद्यावली (97)