राजति कुँवरि परम सुकुवाँरी

Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास

Verse 19 of 268

(राग विलावल ) आवत लाल-प्रिया भुज जोरैं। डगमगात आरस रस भीने, अति सुरंग नैननिं की कोरैं॥[1] चितवन सहज चारु अति चंचल, मुसिकनिं मंद मिथुन-चित चोरैं। 'हित ध्रुव' निरखि रसिक ललितादिक, डारि वारि प्रान तृन तोरैं॥ [2] - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (9) (राग विलावल) आवत लाला-प्रिया भुज जोरैं। दमगत अरस रस भिने, अति सुरंग नन्निन की कुरान..[1] चितवन सहज चारु अति चंचल, संगीत मन्द, मिथुन चोर। 'हित ध्रुव' निरखि रसिक ललितादिक, डारि वारि प्राण त्रिन तोरेन.. [2] - श्री हित ध्रुवदास, बयालिस लीला, पद्यावली (9)
वृन्दाविपिन प्रणाम करिवृन्दाविपिन प्रणाम करि