वृन्दाविपिन प्रणाम करि

Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास

Verse 198 of 268

महिमा वृन्दाविपिन की, कहि न सकत मम जीह। जाके रसना द्वै सहस, तीनहूँ काढ़ी लीह॥ - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (111) वृन्दाविपिन की महिमा कहीं नहीं जा सकती। जेके रसना द्वै सहस, तिनहुँ हरद लिह.. - श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, वृन्दावन शत लीला (111)
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