वृन्दाविपिन प्रणाम करि
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 200 of 268
मति प्रमान चाहत कह्यौ, सोऊ कहत लजात।
सिन्धु अगम जिहिं पार नहिं, कैसे सीप समात॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (113)
धन की अभिलाषा कहते हो, तो कहते हो शर्म। जहां सिंधु पार नहीं हो सकती, वहां एक घूंट भी कैसे पीया जा सकता है.. - श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, वृन्दावन शत लीला (113)