वृन्दाविपिन प्रणाम करि
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 213 of 268
(सवैया)
रूप की रासि किसोर-किसोरी, रँगे रस-केलि निकुंज बिहारा।
माते अनंग प्रवीन सबै अँग, फूल सिरीषहु ते सुकुमारा॥ [1]
बसौ उर-नैननिं में दिन-रैन, नसौ मन के जिते आहिं बिकारा।
जाँचत बात न और कछु 'ध्रुव', देहु प्रिये रस-प्रेम की धारा॥ [2]
- श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत (3.44)
(सवैया) रूप का सार है किसोरा-किशोरी, सार का रंग है-केली निकुंज बिहारा। मते अंग प्रवीण सबा अंग, फुल सिरिशहु ते सुकुमारा.. [1] बसौ उरा-नन्निन मुख्य दिन-रन, नसौ मन के जीते अहिन बिकारा। जंचत बट न और कछु 'ध्रुव', देहु प्रिये रस-प्रेम की धारा.. [2] - श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, श्रृंगार शत (3.44)