वृन्दाविपिन प्रणाम करि

Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास

Verse 217 of 268

(कवित्त) ऐसी हैं ललित प्यारी, लाल जू की प्रान प्यारी, डीठहु न ठहराती कैसैं कै निहारियै। [1] जाकी परछाईं पर कोटि कोटि चंद अरु, दामिनी भामिनि काम कोटि कोटि वारियै॥ [2] काजर की रेख जहाँ पाननि की पीक भारी, और सुखुमारताई कैसें कै विचारियै। [3] सहजि अंग अंग रूप सार मोद मई, 'हित ध्रुव' प्राण न्यौछावर कर डारिये॥ [4] - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (31) (कविता) ललित प्यारी ऐसी है, लाल जू की जान प्यारी, कैसे देखूँ उसे बिना रुके। [1] जाकी परचै पर कोटि कोटि चंद अरु, दामिनी भामिनि काम कोटि कोटि वारियै.. [2] काजर की पंक्ति जहां पन्नी का चुनना भारी, और सुखुमरताई कैसेन की सोच। [3] सहजि अंग अंग रूप सिर मोद माई, 'हित ध्रुव' जीवन दे.. [4] - श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, शृंगार शत 1 (31)
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