(कवित्त)

Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास

Verse 220 of 268

(कवित्त) अति अलबेली भाँति झूलैं अलबेली प्रिये, सहज छबीली छबि नवल निहारहिं। [1] सारी सुही सुरंग परत खसि खसि सखी, बार बार प्यारौ पिय फूल सों सँवारहीं॥ [2] जेही ओर अंग पट भूषण खिसत पिय, तेहिं ओर मुरि मुरि प्राण ज्यौं संभारहिं। [3] हित ध्रुव प्रीतम के नाहिं और दूजी गति, छिन छिन तिनहीं के सुखही विचारहीं॥ [4] - श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (35) (कविता) झूलैन बहुत ही निश्चिंत, निश्चिंत, स्नेहमयी, सहज और निश्चिंत छवि प्रतीत होती है। [1] सब सुंदर सुरंग परतें, अति विशेष मित्र, प्रिय फूल बारंबार सजे हैं.. [2] जहां टूट रहे हैं अंग हमारे, ऐसे बचा रहे हैं प्राण हमारे। [3] प्रियतम के लिए नहीं, किसी और गति के लिए मारो खंभा, छीन लो सुख। [4] - श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, शृंगार शत 1 (35)
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