वृन्दाविपिन प्रणाम करि

Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास

Verse 221 of 268

औगुन करै समुद्र सम, गनत न अपनों जान। राई के सम भजन कौं, मानत मेरु समान॥ - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, मन शिक्षा (60) मैं सागर बनकर गाऊंगा, अपनों को नहीं गिनूंगा। जो मेरी पूजा करता है, वह मेरा आदर करता है.. - श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, मन शिक्षा (60)
(कवित्त)वृन्दाविपिन प्रणाम करि