वृन्दाविपिन प्रणाम करि

Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास

Verse 222 of 268

(कवित्त) रूप की नौलासी प्यारी नाना रंग के सुभाइ, भाइनि की मृदुताई कही न परति है। [1] नैननिं के आगैं लाल लिये रहैं निसि दिन, एकौ छिन मन तें न क्यौंहूँ बिसरति है॥ [2] भीजिं-भीजिं जात पिय सुख के तरंगनि में, जब प्रिया बातनि के रंग में ढरति है। [3] 'हित ध्रुव’ प्यारे जू की जीवन किसोरी गोरी, छिन-छिन प्रीतम के मन कौं हरति है॥ [4] - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (40) (कविता) नौ रंग वाली प्यारी भाभी की कोमलता कहीं खो नहीं गई है। [1] मेरी भाभी की आंखें लाल हैं, एक-एक आंख क्यों न याद हो... [2] मन जी भर कर खुशी की लहरों को पीता है, जब किसी आदमी की धरती उसकी प्यारी पत्नी के रंग की होती है। [3] 'हिट ध्रुव' प्रिय चिड़ियाघर के प्राण, सुंदरी का हृदय हारे, प्रियतम को छीना.. [4] - श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, शृंगार शत 1 (40)
वृन्दाविपिन प्रणाम करिछवि ठाड़ी कर जोरे, रूप कला चौर ढोरैं